Passage 60.4
तꣳ होवाच किङ्गोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरꣳ सा मा प्रत्यब्रवीद्बह्वहं चरन्ती परिचरिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोऽहꣳ सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[गौतमः] तम् ह उवाच—सोम्य, [त्वम्] नु किङ्गोत्रः असि इति । सः ह उवाच—भोः, अहम् यद्गोत्रः अस्मि, एतत् न वेद । मातरम् अपृच्छम्; सा मा प्रत्यब्रवीत्—अहम् बहु चरन्ती परिचरिणी यौवने त्वाम् अलभे । सा अहम् त्वम् यद्गोत्रः असि, एतत् न वेद । तु अहम् जबाला नाम अस्मि; त्वम् सत्यकामः नाम असि इति । भोः, सः अहम् सत्यकामः जाबालः अस्मि इति ।
हिन्दी अर्थ
गौतम ने पूछा: “प्रिय, तुम किस गोत्र के हो?” उसने कहा: “भगवन्, मैं नहीं जानता कि मेरा गोत्र क्या है। मैंने माता से पूछा था। उन्होंने कहा: ‘युवावस्था में मैं परिचारिका बनकर बहुत इधर-उधर सेवा करती थी; उसी समय तुम्हें पाया। इसलिए तुम्हारा गोत्र नहीं जानती। मेरा नाम जबाला है और तुम्हारा नाम सत्यकाम है।’ इसलिए, भगवन्, मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।”
English meaning
Gautama asked, “Dear one, what is your lineage?” He replied, “Sir, I do not know my lineage. I asked my mother, and she answered, ‘In my youth I moved about much in service as an attendant, and during that time I had you. I do not know your lineage. My name is Jabālā and yours is Satyakāma.’ So, sir, I am Satyakāma Jābāla.”
व्याख्या
माता के कथन की पूरी पुनरावृत्ति सत्य बोलने के प्रसंग को निर्णायक बनाती है। परिचरिणी का स्रोत-रूप पिछली इकाई के परिचारिणी से थोड़ा भिन्न है; अर्थ-संबंध स्पष्ट होने पर भी रूप को चुपचाप समान नहीं किया गया।
Explanation
The full repetition makes truthfulness central to the scene. The source’s paricariṇī differs slightly from paricāriṇī in the earlier unit; its meaning is related, but its form is not silently regularized.
संदर्भ
सत्यकाम शिक्षक से वही कहता है जो माता ने बताया था, बिना सुविधाजनक वंश गढ़े।
Context
Satyakāma repeats his mother’s account to the teacher without inventing a more convenient pedigree.