Passage 53.7
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्र ह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् विद्वान् ऐतरेयः महिदासः एतत् ह स्म वै आह—सः [त्वम्] मे एतत् किम् उपतपसि, यः अहम् अनेन न प्रेष्यामि इति । सः ह षोडशम् वर्षशतम् अजीवत् । यः एवम् वेद, [सः] ह षोडशम् वर्षशतम् प्र जीवति ।
हिन्दी अर्थ
इसे जानकर महिदास ऐतरेय ने कहा था: “तू मुझे यह कष्ट क्यों देता है? मैं इस कष्ट से मरने वाला नहीं हूँ।” वे एक सौ सोलह वर्ष जिए। जो इस प्रकार जानता है, वह एक सौ सोलह वर्ष तक जीवित रहता है।
English meaning
Knowing this, Mahidāsa Aitareya said: “Why do you afflict me in this way? I shall not die from this.” He lived for one hundred and sixteen years. One who knows this lives for one hundred and sixteen years.
व्याख्या
षोडशं वर्षशतम् को इस प्रसंग में सौ और सोलह, कुल 116, पढ़ना तीन चरणों के योग से पुष्ट होता है; इसे 1600 वर्ष नहीं किया गया। सम्बोधन रोग या कष्ट के प्रति है। कथित दीर्घायु और रोग पर विजय परम्परागत धार्मिक दावा हैं, सत्यापित चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं।
Explanation
The expression ṣoḍaśaṃ varṣaśatam is read here as one hundred plus sixteen, consistent with the three stages, not sixteen hundred years. The challenge addresses the affliction. The longevity and overcoming of illness are traditional religious claims, not independently established medical conclusions.
संदर्भ
तीन सवनों के 116-वर्षीय जीवन-यज्ञ को महिदास ऐतरेय के उदाहरण से पुष्ट किया जाता है।
Context
Mahidāsa Aitareya’s example supports the 116-year life-sacrifice formed by the three pressings.