Passage 35.4
अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिꣳशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनꣳ स्पर्शेषूपालभेत मृत्युꣳ शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति धक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यदि एनम् ऊष्मसु उपालभेत, [अहम्] प्रजापतिम् शरणम् प्रपन्नः अभूवम्; सः त्वा प्रतिपेक्ष्यति इति एनम् ब्रूयात् । अथ यदि एनम् स्पर्शेषु उपालभेत, [अहम्] मृत्युम् शरणम् प्रपन्नः अभूवम्; सः त्वा प्रतिधक्ष्यति इति एनम् ब्रूयात् ।
हिन्दी अर्थ
यदि कोई उसके ऊष्म-वर्णों में दोष निकाले, तो वह कहे, “मैं प्रजापति की शरण गया हूँ; वही तुम्हें चूर कर देगा।” और यदि कोई स्पर्श-वर्णों में दोष निकाले, तो कहे, “मैं मृत्यु की शरण गया हूँ; वही तुम्हें जला देगा।”
English meaning
If someone criticises his breath-friction sounds, he should say, “I have taken refuge in Prajāpati; he will crush you.” If someone criticises his stop consonants, he should say, “I have taken refuge in Death; he will burn you.”
व्याख्या
यह प्राचीन अनुष्ठानिक प्रतिवचन की तीव्र भाषा है। इसे आज आलोचक को धमकाने के निर्देश के रूप में नहीं प्रस्तुत किया गया है।
Explanation
This is the forceful language of an ancient ritual rejoinder. It is reported as historical textual content, not recommended as a way to threaten critics today.
संदर्भ
यह खण्ड गायक के स्वर, मानसिक संकल्प और वर्णोच्चारण को देवताओं तथा यज्ञफल से जोड़ता है।
Context
This section connects the singer’s vocal style, inward intentions and articulation with deities and sacrificial results.