Passage 34.4
यस्तद्वेद स वेद सर्वꣳसर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासीत तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यः तत् वेद, सः सर्वम् वेद । सर्वाः दिशः अस्मै बलिम् हरन्ति । सर्वम् अस्मि इति उपासीत । तत् व्रतम् [अस्ति]; तत् व्रतम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जो उसे जानता है, वह सब जानता है। सभी दिशाएँ उसके लिए भेंट लाती हैं। “मैं सब हूँ” इस प्रकार उपासना करे; यही उसका व्रत है, यही उसका व्रत है।
English meaning
One who knows that knows all. All directions bring him tribute. One should contemplate, “I am all.” This is the observance; this is the observance.
व्याख्या
दिशाओं की भेंट सर्वत्र से मिलने वाले समर्थन और समृद्धि की चित्रात्मक भाषा है। सर्वमस्मि ध्यान का सूत्र है; इसका प्रयोग दूसरों पर व्यक्तिगत प्रभुत्व के औचित्य के रूप में नहीं किया गया।
Explanation
Tribute from the directions pictures support and abundance coming from all sides. “I am all” is a contemplative formula, not a justification for personal domination over others.
संदर्भ
अलग-अलग उपासनाओं के बाद अब पाँच त्रिकों द्वारा साम को समस्त जगत् में गुँथा हुआ बताया जाता है।
Context
After the particular contemplations, five triads present the Sāman as woven through the whole world.