Passage 145.6
तदेष श्लोकः। शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् एषः श्लोकः [अस्ति]—हृदयस्य शतम् च एका च नाड्यः [सन्ति] । तासाम् एका मूर्धानम् अभिनिःसृता [अस्ति] । तया ऊर्ध्वम् आयन् अमृतत्वम् एति । अन्याः विष्वक् उत्क्रमणे भवन्ति; उत्क्रमणे भवन्ति ।
हिन्दी अर्थ
इस विषय में यह श्लोक है: हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमें एक सिर की ओर निकलती है। उसके द्वारा ऊपर जाते हुए अमृतत्व प्राप्त होता है। अन्य नाड़ियाँ प्रस्थान के समय विभिन्न दिशाओं में जाती हैं; प्रस्थान के समय जाती हैं।
English meaning
On this there is a verse: the heart has a hundred and one channels. One of them extends into the head. Ascending by that one, a person reaches immortality. The others lead outward in various directions at departure; they serve for departure.
व्याख्या
एक सौ एक की संख्या, सिर की ओर जाने वाली एक नाड़ी और अन्य दिशाओं की अनेक नाड़ियाँ अलग रखी गई हैं। यह पारम्परिक सूक्ष्म-शरीर का चित्र है, आधुनिक शरीर-रचना का गणना-मानक नहीं। अन्त का दोहराव जानबूझकर सुरक्षित है।
Explanation
The number 101, the single channel toward the head, and the other channels leading in different directions are kept distinct. This is traditional subtle-body imagery, not an anatomical count. The closing repetition is intentionally retained.
संदर्भ
उद्धृत श्लोक नाड़ी-मार्ग की शिक्षा को संक्षेप में पूरा करता है।
Context
A quoted verse concludes the teaching about the channel routes.