Passage 145.3
तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् यत्र एतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नम् न विजानाति, तदा आसु नाडीषु सृप्तः भवति । तम् न कश्चन पाप्मा स्पृशति; हि तदा तेजसा सम्पन्नः भवति ।
हिन्दी अर्थ
जब व्यक्ति सोया हुआ, पूरी तरह एकत्र और शान्त होता है तथा कोई स्वप्न नहीं जानता, तब वह इन नाड़ियों में प्रविष्ट होता है। उस समय कोई पाप उसे नहीं छूता, क्योंकि वह तेज से संयुक्त होता है।
English meaning
When a person is asleep, gathered into himself and serene, knowing no dream, he has entered these channels. No evil touches him then, for at that time he is united with radiance.
व्याख्या
समस्त, सम्प्रसन्न और स्वप्न का न जानना तीन अलग संकेत हैं। तेज को यहाँ प्रकाशमय तत्त्व कहा गया है। यह नींद की धार्मिक व्याख्या है, आधुनिक निद्रा-निदान या नैतिक जिम्मेदारी का निरसन नहीं।
Explanation
Gatheredness, serenity, and absence of dream awareness are three separate features. Tejas is rendered as radiance. The passage offers a religious account of sleep, not a modern sleep diagnosis or removal of ethical responsibility.
संदर्भ
नाड़ी-वर्णन अब स्वप्नरहित निद्रा की दशा समझाता है।
Context
The account of the channels now addresses dreamless sleep.