Passage 140.6
तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताꣳश्च सत्यान्कामाꣳस्तेषाꣳ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताꣳश्च सत्यान्कामाꣳस्तेषाꣳ सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् यथा इह कर्मजितः लोकः क्षीयते, एवम् एव अमुत्र पुण्यजितः लोकः क्षीयते । तत् ये इह आत्मानम् एतान् च सत्यान् कामान् अननुविद्य व्रजन्ति, तेषाम् सर्वेषु लोकेषु अकामचारः भवति । अथ ये इह आत्मानम् एतान् च सत्यान् कामान् अनुविद्य व्रजन्ति, तेषाम् सर्वेषु लोकेषु कामचारः भवति ।
हिन्दी अर्थ
जैसे यहाँ कर्म से प्राप्त लोक क्षीण हो जाता है, वैसे ही वहाँ पुण्य से प्राप्त लोक भी क्षीण हो जाता है। जो यहाँ आत्मा और इन सत्य कामनाओं को जाने बिना चले जाते हैं, उन्हें सभी लोकों में इच्छानुसार विचरण की स्वतंत्रता नहीं होती। पर जो यहाँ आत्मा और इन सत्य कामनाओं को जानकर चले जाते हैं, उन्हें सभी लोकों में इच्छानुसार विचरण की स्वतंत्रता होती है।
English meaning
Just as a world won by action here wears away, so a world won by merit there also wears away. Those who depart from here without discovering the self and these true desires do not have freedom to move at will in all worlds. Those who depart after discovering the self and these true desires do have freedom to move at will in all worlds.
व्याख्या
पहले वाक्य में कर्मजित और पुण्यजित दोनों लोक नश्वर हैं। आगे “जाने बिना” और “जानकर”, तथा अकामचार और कामचार की जोड़ियाँ निर्णायक हैं। सभी लोकों की स्वतंत्रता पाठ का आध्यात्मिक फलवचन है, अनुभवसिद्ध सांसारिक अधिकार की गारंटी नहीं।
Explanation
Both the world gained by action and that gained by merit are perishable. The contrasts without/with knowledge and restricted/free movement are essential. Freedom in all worlds is the text’s spiritual promise, not a guarantee of empirically demonstrable worldly powers.
संदर्भ
सीमित कर्मफल और आत्मज्ञान से जुड़ी स्वतंत्रता का स्पष्ट विरोध रखा जाता है।
Context
The passage contrasts the limited fruits of action with freedom associated with self-knowledge.