Passage 66.5
प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[अग्नयः ऊचुः—] प्राणः ब्रह्म [अस्ति]; कम् ब्रह्म [अस्ति]; खम् ब्रह्म [अस्ति] इति । सः ह उवाच—यत् प्राणः ब्रह्म [अस्ति], [तत्] अहम् विजानामि । तु कम् च खम् च न विजानामि इति । ते ह ऊचुः—यत् वाव कम्, तत् एव खम्; यत् एव खम्, तत् एव कम् इति । [ते] अस्मै ह प्राणम् च तदाकाशम् च ऊचुः ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने कहा: “प्राण ब्रह्म है, कं अर्थात् सुख ब्रह्म है, खं अर्थात् आकाश ब्रह्म है।” उसने कहा: “प्राण ब्रह्म है, यह मैं समझता हूँ; पर कं और खं को नहीं समझता।” उन्होंने कहा: “जो कं है, वही खं है; और जो खं है, वही कं है।” इस प्रकार उन्होंने उसे प्राण और उस आकाश का उपदेश दिया।
English meaning
They said, “Vital breath is Brahman; kam, joy, is Brahman; kham, space, is Brahman.” He replied, “I understand that vital breath is Brahman, but I do not understand kam and kham.” They said, “What is kam is precisely kham, and what is kham is precisely kam.” In this way they taught him vital breath and that space.
व्याख्या
कं और खं की ध्वनिगत निकटता उनके परस्पर स्पष्टीकरण में काम आती है। सुख को आकाश की व्यापकता से और आकाश को सुख से जोड़कर दोनों को साधारण सीमित अनुभव से आगे समझने का संकेत मिलता है। यह व्याख्या हर क्षणिक सुख को ब्रह्मज्ञान मान लेने का आधार नहीं है।
Explanation
The similar sounds kam and kham support a reciprocal clarification. Joy is understood through spaciousness, and space through joy, inviting more than an ordinary limited experience of either. This does not equate every passing pleasure with knowledge of Brahman.
संदर्भ
अग्नियों का सामूहिक उपदेश प्राण, सुख और आकाश के सम्बन्ध पर केन्द्रित है।
Context
The fires’ joint teaching centers on vital breath, joy and space.