Passage 66.3
स ह व्याधिनानशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह [उपकोसलः] व्याधिना अनशितुम् दध्रे । तम् आचार्यजाया उवाच—ब्रह्मचारिन्, अशान; किम् नु न अश्नासि इति । सः ह उवाच—अस्मिन् पुरुषे इमे बहवः कामाः [सन्ति]; नानात्ययाः [व्याधयः सन्ति]; [तैः] व्याधिभिः प्रतिपूर्णः अस्मि; न अशिष्यामि इति ।
हिन्दी अर्थ
उपकोसल ने व्यथा से भोजन न करने का निश्चय किया। आचार्य की पत्नी ने उससे कहा: “ब्रह्मचारी, खाओ; तुम भोजन क्यों नहीं कर रहे?” उसने कहा: “इस व्यक्ति में अनेक इच्छाएँ हैं, जो अलग-अलग दिशाओं को जाती हैं। मैं व्यथाओं से भरा हूँ; मैं नहीं खाऊँगा।”
English meaning
In distress, Upakosala resolved not to eat. The teacher’s wife said to him, “Student, eat. Why are you not eating?” He replied, “There are many desires in this person, moving toward different ends. I am filled with afflictions; I will not eat.”
व्याख्या
व्याधि यहाँ पीड़ा या व्यथा को कहता है; कोई आधुनिक मानसिक या शारीरिक रोग निश्चित नहीं किया गया। उपवास कथा की घटना है, पाठक के लिए भोजन छोड़ने की सलाह नहीं। आचार्य की पत्नी का पहले खिलाने का आग्रह भी पूरा रखा गया है।
Explanation
Vyādhi denotes affliction here without establishing a modern diagnosis. Refusing food is a narrated event, not advice that readers should stop eating. The wife’s invitation to eat is retained as part of the scene.
संदर्भ
शिक्षा न मिलने की पृष्ठभूमि में उपकोसल अपने भीतर की व्यथा और इच्छाओं का वर्णन करता है।
Context
Against the background of withheld instruction, Upakosala describes inward distress and conflicting desires.