Passage 58.3
तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
परः तम् उ ह प्रत्युवाच—अह, शूद्र, हारेत्वा [गन्त्री] गोभिः सह तव एव अस्तु इति । तत् उ ह पुनः एव पौत्रायणः जानश्रुतिः गवाम् सहस्रम् निष्कम् अश्वतरीरथम् दुहितरम् तत् आदाय प्रतिचक्रमे ।
हिन्दी अर्थ
रैक्व ने उत्तर दिया: “अरे शूद्र, यह हार और रथ गायों सहित तेरे ही पास रहें।” तब जानश्रुति पौत्रायण फिर एक हजार गायें, निष्क, खच्चरियों वाला रथ और अपनी पुत्री लेकर उसके पास गया।
English meaning
Raikva replied, “Ah, Śūdra, let the necklace and carriage remain yours, together with the cows.” Jānaśruti Pautrāyaṇa then returned, this time bringing a thousand cows, the niṣka, the mule-drawn carriage, and his daughter.
व्याख्या
शूद्र सम्बोधन संस्कृत में स्पष्ट है, इसलिए उसे अनुवाद से हटाया नहीं गया। वह जन्मगत पहचान है या प्रसंगगत तिरस्कार, इस पर व्याख्याएँ भिन्न हैं। पुत्री को उपहारों के साथ लाने का वर्णन प्राचीन सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है, वर्तमान आचरण की स्वीकृति नहीं।
Explanation
The address Śūdra is explicit and is not suppressed. Whether it identifies inherited status or is a contextual rebuke is debated. The inclusion of a daughter among what is brought belongs to the ancient social narrative, not an endorsement of treating people as possessions.
संदर्भ
पहला प्रस्ताव अस्वीकार होता है। जानश्रुति अधिक उपहार और अपनी पुत्री के साथ लौटता है।
Context
The first offer is rejected. Jānaśruti returns with more gifts and his daughter.