Passage 142.4
अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यः एषः सम्प्रसादः अस्मात् शरीरात् समुत्थाय परम् ज्योतिः उपसम्पद्य स्वेन रूपेण अभिनिष्पद्यते, एषः आत्मा इति ह उवाच । एतत् अमृतम् अभयम्; एतत् ब्रह्म इति । तस्य ह वै एतस्य ब्रह्मणः नाम सत्यम् इति ।
हिन्दी अर्थ
फिर यह पूर्ण शान्ति को प्राप्त सत्ता इस शरीर से उठकर परम ज्योति को प्राप्त होती है और अपने ही स्वरूप में प्रकट होती है। उसने कहा, “यही आत्मा है; यह अमृत है, अभय है, यह ब्रह्म है।” इस ब्रह्म का नाम “सत्यम्” है।
English meaning
Now this serene being rises from this body, reaches the highest light, and becomes manifest in its own form. He said, “This is the self; this is immortal, fearless; this is Brahman.” The name of this Brahman is Satyam, the true.
व्याख्या
सम्प्रसाद गहरी नींद में शान्त जीव के लिए भी प्रयुक्त होता है; यहाँ उसे केवल नींद की अवस्था में सीमित नहीं किया गया। शरीर से उठना मुक्ति या शरीरान्त की भाषा में पढ़ा जा सकता है। किसी एक दार्शनिक पद्धति का निष्कर्ष अर्थ में आरोपित नहीं है।
Explanation
Samprasāda can designate the living self in the serenity of deep sleep, but it is not reduced here to a sleep state. Rising from the body may be read in the language of liberation or departure at death. The translation does not impose one philosophical system’s conclusion.
संदर्भ
अन्तर्यामी आत्मा का वर्णन शान्ति, परम ज्योति और स्वस्वरूप की ओर बढ़ता है।
Context
The account moves from the inward self to serenity, highest light, and manifestation in its own form.