Passage 99.2
कुतस्तु खलु सोम्यैवँस्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति। सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सोम्य, कुतः तु खलु एवम् स्यात् इति ह उवाच; असतः सत् कथम् जायेत इति । सोम्य, अग्रे इदम् सत् तु एव आसीत्, एकम् एव अद्वितीयम् [आसीत्] ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने कहा, “पर प्रिय, ऐसा कैसे हो सकता है? असत् से सत् कैसे उत्पन्न होगा? प्रिय, आरम्भ में यह सत् ही था, एक ही, जिसका दूसरा नहीं था।”
English meaning
He said, “But, my dear, how could that be? How could Being arise from Non-being? My dear, in the beginning this was Being alone, one only, without a second.”
व्याख्या
यह कारण और अस्तित्व पर दार्शनिक तर्क है। इसे आधुनिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान के किसी सिद्धान्त का प्रत्यक्ष समर्थन या खण्डन न माना जाए। सत् के सकारात्मक प्रतिपादन तक तर्क का क्रम यथावत रखा गया है।
Explanation
This is a philosophical argument about existence and causation. It should not be presented as directly confirming or refuting a modern cosmological theory. The challenge leads back to the positive assertion of Being.
संदर्भ
उद्दालक असत् से सत् के जन्म की धारणा पर आपत्ति करते हैं।
Context
Uddālaka challenges the proposal that Being arises from Non-being.