Passage 64.4
स य एतमेवं विद्वाꣳश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिꣳल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाꣳश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यः एतम् ब्रह्मणः चतुष्कलम् पादम् एवम् विद्वान् आयतनवान् इति उपास्ते, सः अस्मिन् लोके आयतनवान् भवति । यः एतम् ब्रह्मणः चतुष्कलम् पादम् एवम् विद्वान् आयतनवान् इति उपास्ते, [सः] ह आयतनवतः लोकान् जयति ।
हिन्दी अर्थ
जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद की “आयतनवान्” के रूप में उपासना करता है, वह इस लोक में आयतनवान्, आधारयुक्त, होता है। जो इस प्रकार जानकर ब्रह्म के इस चार कलाओं वाले पाद की “आयतनवान्” के रूप में उपासना करता है, वह आधारयुक्त लोकों को प्राप्त करता है।
English meaning
One who knows this and contemplates this four-part quarter of Brahman as Possessed of a Dwelling becomes established with a dwelling in this world. One who knows this and contemplates this four-part quarter of Brahman as Possessed of a Dwelling wins worlds that have a dwelling or support.
व्याख्या
आयतन के अर्थ में निवास और आधार दोनों सम्भव हैं, इसलिए फल को स्थिर आधार पाने की दिशा में समझाया गया है। अगले खण्ड में सत्यकाम मानव आचार्य से भी शिक्षा की पुष्टि माँगेगा।
Explanation
The sense of āyatana includes both dwelling and support, so the result evokes being established. The next section will have Satyakāma seek confirmation from his human teacher as well.
संदर्भ
चौथे पाद की फलश्रुति चारों गैर-मानवीय शिक्षकों की शिक्षा पूरी करती है।
Context
The fourth quarter’s result completes the instruction from the four nonhuman teachers.