Passage 56.2
तद्यद्रजतꣳसेयं पृथिवी यत्सुवर्णꣳ सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बꣳसमेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकꣳस समुद्रः ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् यत् रजतम् [आसीत्], सा इयम् पृथिवी [अभवत्] । यत् सुवर्णम् [आसीत्], सा द्यौः [अभवत्] । यत् जरायु [आसीत्], ते पर्वताः [अभवन्] । यत् उल्बम् [आसीत्], [सः] समेघः नीहारः [अभवत्] । याः धमनयः [आसन्], ताः नद्यः [अभवन्] । यत् वास्तेयम् उदकम् [आसीत्], सः समुद्रः [अभवत्] ।
हिन्दी अर्थ
उसमें जो चाँदी का था, वह यह पृथ्वी है; जो सोने का था, वह द्युलोक है। उसका जरायु पर्वत बने; उसकी भीतरी झिल्ली मेघों सहित कुहरा बनी। उसकी धमनियाँ नदियाँ बनीं और उसके बस्ति का जल समुद्र बना।
English meaning
Its silver portion is this earth, and its golden portion is heaven. Its outer membrane became the mountains; its inner membrane became mist together with clouds. Its channels became rivers, and the fluid of its bladder became the ocean.
व्याख्या
पृथ्वी और द्युलोक के बाद पर्वत, मेघयुक्त कुहरा, नदियाँ और समुद्र, सभी सूचीबद्ध हैं। जरायु और उल्ब को क्रमशः मोटे बाहरी और सूक्ष्म भीतरी गर्भावरण के रूप में समझा गया है। वास्तेय जल को बस्ति से सम्बन्धित कहा गया है; इसे अस्पष्ट रूप से केवल सामान्य पानी नहीं बनाया गया।
Explanation
Earth and heaven are followed by mountains, cloud-bearing mist, rivers and ocean. Jarāyu and ulba are taken as the outer and inner fetal membranes. Vāsteya water is associated with the bladder rather than being reduced to unspecified water.
संदर्भ
विश्व-अण्ड के आवरणों और भीतरी अंगों से विश्व के विभिन्न भागों की पहचान की जाती है।
Context
The coverings and internal features of the cosmic egg are identified with different parts of the world.