Passage 51.4
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
एषः मे आत्मा अन्तः हृदये सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वम् इदम् अभ्यात्तः अवाकी अनादरः [अस्ति] । एतत् ब्रह्म [अस्ति] । “एतम् इतः प्रेत्य अभिसंभविता अस्मि” इति यस्य [निश्चयः] स्यात्, [यस्य] अद्धा न विचिकित्सा अस्ति, [सः तथैव प्रतिपद्यते] इति ह स्म शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः आह ।
हिन्दी अर्थ
सभी कर्मों, सभी कामनाओं, सभी गन्धों और सभी रसों को समेटे, यह सब अपने भीतर धारण किए हुए, वाणी और आग्रह से रहित, हृदय के भीतर मेरा यही आत्मा ब्रह्म है। “यहाँ से जाने के बाद मैं इसे प्राप्त होऊँगा”, जिसके भीतर यह निश्चय हो, उसके लिए सचमुच कोई संशय नहीं रहता। ऐसा शाण्डिल्य ने कहा; शाण्डिल्य ने कहा।
English meaning
Containing all actions, all desires, all scents and all tastes, embracing all this, without speech and without anxious attachment, this Self of mine within the heart is Brahman. “After departing from here I shall attain it”: for one who holds this conviction, there is indeed no doubt. So Śāṇḍilya said; so Śāṇḍilya said.
व्याख्या
अभिसम्भविता अस्मि की संयुक्त क्रिया प्राप्त होने या उससे एकत्व में पहुँचने का भविष्यभाव देती है; भिन्न दर्शन इसके स्वरूप को अलग तरह समझाते हैं। अद्धा न विचिकित्सास्ति दृढ़ विश्वास की बात है। नाम का दोहराव खण्डसमाप्ति का पारम्परिक संकेत है।
Explanation
The future construction abhisambhavitāsmi expresses attaining or coming into union with that reality; philosophical traditions explain the nature of this differently. “Indeed there is no doubt” marks settled conviction. Repetition of the teacher’s name serves as a traditional closing signal.
संदर्भ
शाण्डिल्यविद्या की समाप्ति में हृदयस्थ आत्मा और ब्रह्म की पहचान को दृढ़ निश्चय के रूप में अपनाया जाता है।
Context
The Śāṇḍilya teaching closes by making the identity of the inward Self and Brahman the content of settled conviction.