Passage 146.4
तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
प्रजापतिः तौ ह उवाच—यः एषः अक्षिणि पुरुषः दृश्यते, एषः आत्मा इति ह उवाच; एतत् अमृतम् अभयम्, एतत् ब्रह्म इति । अथ [तौ ऊचतुः]—भगवः, यः अयम् अप्सु परिख्यायते, यः च अयम् आदर्शे [परिख्यायते], एषः कतमः इति । एषः उ एव एषु सर्वेषु अन्तेषु परिख्यायते इति ह उवाच ।
हिन्दी अर्थ
प्रजापति ने दोनों से कहा, “आँख में जो पुरुष दिखाई देता है, यही आत्मा है। यह अमृत है, अभय है, यह ब्रह्म है।” उन्होंने पूछा, “भगवन्, जो जल में दिखाई देता है और जो दर्पण में दिखाई देता है, इनमें यह कौन है?” उन्होंने कहा, “यही इन सब स्थानों में दिखाई देता है।”
English meaning
Prajāpati told them, “The person seen in the eye is the self. This is immortal and fearless; this is Brahman.” They asked, “Sir, what about the one seen in water and the one in a mirror? Which is this?” He replied, “This very one appears in all these places.”
व्याख्या
आत्मा और उसके दृश्य प्रतिबिम्ब का भेद अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। प्रजापति का उत्तर कथा की अगली जाँचों के साथ पढ़ना चाहिए; पाठ स्वयं बाद में केवल शरीर को आत्मा मानने पर आपत्ति करता है।
Explanation
The distinction between the self and its visible reflection is not yet clear. Prajāpati’s answer must be read with the subsequent tests; the narrative later challenges identification of the self with the body alone.
संदर्भ
आँख में दिखने वाले पुरुष का कथन विद्यार्थियों को प्रतिबिम्ब की ओर ले जाता है।
Context
The statement about the person in the eye leads the students to ask about reflections.