Passage 128.4
प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
प्राणः हि एव एतानि सर्वाणि भवति । सः वा एषः एवम् पश्यन्, एवम् मन्वानः, एवम् विजानन् अतिवादी भवति । चेत् तम्, अतिवादी असि इति ब्रूयुः, [सः] अतिवादी अस्मि इति ब्रूयात्, न अपह्नुवीत ।
हिन्दी अर्थ
“क्योंकि प्राण ही ये सब होता है। जो इस प्रकार देखता, इस प्रकार मनन करता और इस प्रकार जानता है, वह अतिवादी, अर्थात् दूसरे सीमित कथनों से आगे की बात कहने वाला होता है। यदि लोग उससे कहें, ‘तुम अतिवादी हो’, तो उसे कहना चाहिए, ‘हाँ, मैं अतिवादी हूँ’; उसे इससे इन्कार नहीं करना चाहिए।”
English meaning
“For life-breath itself is all these. One who sees in this way, reflects in this way and knows in this way becomes an ativādin, one whose statement goes beyond lesser accounts. If people say, ‘You are an ativādin,’ that person should reply, ‘I am an ativādin,’ and should not deny it.”
व्याख्या
अतिवाद का अर्थ यहाँ केवल बढ़-चढ़कर बोलना या विवाद करना नहीं। पिछले स्तरों से आगे की दृष्टि को स्वीकार करना है। फिर भी “सत्य से अतिवदति” का अगला वाक्य बताता है कि संवाद अभी समाप्त नहीं हुआ।
Explanation
Ativāda here is not merely boasting or arguing. It acknowledges an account extending beyond preceding levels. Nevertheless, the next statement about speaking beyond through truth shows that the inquiry is not finished.
संदर्भ
प्राण की शिक्षा का निष्कर्ष अतिवादी पद में आता है; अगले खण्ड में सत्य के आधार पर इसे और आगे बढ़ाया जाएगा।
Context
The teaching on life-breath concludes with the designation ativādin, which the next section will deepen through truth.