Passage 128.3
अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ यदि अपि एनान् उत्क्रान्तप्राणान् शूलेन समासम् व्यतिषंदहेत्, एनम्, पितृहा असि इति न एव ब्रूयुः, मातृहा असि इति न [ब्रूयुः], भ्रातृहा असि इति न [ब्रूयुः], स्वसृहा असि इति न [ब्रूयुः], आचार्यहा असि इति न [ब्रूयुः], ब्राह्मणहा असि इति न [ब्रूयुः] ।
हिन्दी अर्थ
“लेकिन इन्हीं लोगों के प्राण निकल जाने पर यदि कोई उन्हें शूल से एकत्र कर जलाए भी, तो लोग उससे नहीं कहेंगे, ‘तुम पितृहन्ता हो’; न ‘तुम मातृहन्ता हो’; न ‘तुम भ्रातृहन्ता हो’; न ‘तुम बहन के हन्ता हो’; न ‘तुम आचार्यहन्ता हो’; न ‘तुम ब्राह्मणहन्ता हो।’”
English meaning
“But once the life-breath has departed from these same people, even if someone gathers their remains with a pointed implement and burns them, people would not say, ‘You are a father-killer,’ nor ‘a mother-killer,’ nor ‘a brother-killer,’ nor ‘a sister-killer,’ nor ‘a teacher-killer,’ nor ‘a brahmin-killer.’”
व्याख्या
समासं व्यतिषंदहेत् कठिन प्रयोग है; अर्थ को शूल से समेटकर जलाने के रूप में लिया गया है। यह दृष्टान्त प्राण की प्रधानता के लिए है, शवों के प्रति अमर्यादित व्यवहार का सामान्य निर्देश नहीं।
Explanation
Samāsaṃ vyatiṣaṃdahet is a difficult expression, interpreted as gathering and burning with a pointed implement. The illustration argues for the primacy of life-breath, not for a general permission to mistreat bodies.
संदर्भ
मृत शरीर के अन्त्येष्टि-जैसे व्यवहार और जीवित व्यक्ति को पहुँचाई गई चोट के बीच अन्तर रखा जाता है।
Context
The comparison distinguishes handling a lifeless body in a funerary setting from harming a living person.