Passage 102.2
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
पीताः आपः त्रेधा विधीयन्ते । तासाम् यः स्थविष्ठः धातुः [अस्ति], तत् मूत्रम् भवति; यः मध्यमः [धातुः अस्ति], तत् लोहितम् [भवति]; यः अणिष्ठः [धातुः अस्ति], सः प्राणः [भवति] ।
हिन्दी अर्थ
“पिया हुआ जल तीन भागों में बँटता है। उसका सबसे स्थूल अंश मूत्र बनता है; बीच का अंश रक्त बनता है; सबसे सूक्ष्म अंश प्राण बनता है।”
English meaning
“Water that has been drunk is divided three ways. Its coarsest constituent becomes urine, its middle constituent becomes blood, and its finest constituent becomes vital breath.”
व्याख्या
लोहित यहाँ रक्त है और प्राण जीवनधारक श्वास या शक्ति। इस प्रसंग का प्राण केवल ऑक्सीजन का नाम नहीं है। स्थूल, मध्य और सूक्ष्म का क्रम मूल शरीर-विचार की आन्तरिक संरचना है।
Explanation
Lohita here is blood; prāṇa is life-sustaining breath or vitality, not simply oxygen. The coarse, middle, and fine hierarchy belongs to the account’s own bodily theory.
संदर्भ
जल के तीन अंश अन्न की त्रिभागी व्याख्या के समानान्तर हैं।
Context
Water’s three fractions parallel the preceding threefold account of food.