Passage 70.3
इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
इदम् इति [उपकोसलः] ह प्रतिजज्ञे । [आचार्यः आह—] सोम्य, ते किल वाव लोकान् अवोचन् । तु अहम् ते तत् वक्ष्यामि—यथा पुष्करपलाशे आपः न श्लिष्यन्ते, एवम् एवम् विदि पापम् कर्म न श्लिष्यते इति । [उपकोसलः आह—] भगवान् मे ब्रवीतु इति । [आचार्यः] तस्मै ह उवाच ।
हिन्दी अर्थ
उपकोसल ने कहा: “यह कहा,” और उनका उपदेश बताया। आचार्य ने कहा: “प्रिय, उन्होंने तुम्हें लोकों का ही उपदेश दिया है। मैं तुम्हें वह बताऊँगा जिसके जानने वाले से पापकर्म ऐसे नहीं चिपकता जैसे कमल के पत्ते से जल नहीं चिपकता।” उसने कहा: “भगवन्, मुझे बताइए।” तब आचार्य ने उससे कहा:
English meaning
Upakosala answered, “This,” reporting their instruction. The teacher said, “Dear one, they have taught you about worlds. I will tell you that through which evil action does not cling to the knower, just as water does not cling to a lotus leaf.” He said, “Please tell me, sir.” The teacher then addressed him:
व्याख्या
कमल-पत्र की उपमा कर्म के चिपकने और न चिपकने का अन्तर दिखाती है। यह हानिकारक कर्म करने की छूट नहीं है; कथन आत्मविद्या के फल की भाषा में है। वाक्य अगले खण्ड की आत्मा-विषयक शिक्षा का प्रवेश है।
Explanation
The lotus-leaf image contrasts clinging with nonclinging. It is not permission to commit harmful acts; it describes a result of knowledge of the self. The sentence introduces the teaching in the next section.
संदर्भ
आचार्य अग्नियों के उपदेश से आगे अलिप्तता का विषय खोलता है।
Context
The teacher moves from the fires’ instruction toward nonattachment to evil action.