Passage 70.2
भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
भगवः इति [उपकोसलः] ह प्रतिशुश्राव । [आचार्यः आह—] सोम्य, ते मुखम् ब्रह्मविदः इव भाति । त्वा कः नु अनुशशास इति । [उपकोसलः आह—] भोः, मा कः नु अनुशिष्यात् इति इह अप निह्नुते इव । इमे नूनम् ईदृशाः [सन्ति], [पूर्वम्] अन्यादृशाः [आसन्] इति इह अग्नीन् अभ्यूदे । [आचार्यः पप्रच्छ—] सोम्य, ते किम् नु किल अवोचन् इति ।
हिन्दी अर्थ
उपकोसल ने उत्तर दिया: “भगवन्!” आचार्य ने कहा: “प्रिय, तुम्हारा मुख ब्रह्मज्ञानी की तरह चमकता है। तुम्हें किसने शिक्षा दी?” उसने कहा: “भगवन्, मुझे कौन शिक्षा देता?” इस तरह उसने मानो बात छिपाई। फिर अग्नियों की ओर संकेत करके कहा: “ये पहले ऐसी थीं; अब दूसरी-सी हैं।” आचार्य ने पूछा: “प्रिय, उन्होंने तुम्हें क्या कहा?”
English meaning
Upakosala answered, “Sir!” The teacher said, “Dear one, your face shines like that of a knower of Brahman. Who has instructed you?” He replied, “Who would instruct me, sir?”, as though concealing it. Then, pointing toward the fires, he said, “These were of one kind; now they seem different.” The teacher asked, “Dear one, what did they tell you?”
व्याख्या
ब्रह्मविद इव में “की तरह” बना हुआ है। बीच के वाक्य अत्यन्त संक्षिप्त हैं और ईदृशाः-अन्यादृशाः का आशय अग्नियों के बदले हुए अनुभव से लिया गया है। कथा को स्पष्ट करने के लिए बोलने वालों का सम्बन्ध जोड़ा गया है, जिसकी समीक्षा आवश्यक है।
Explanation
The comparison remains “like” a knower of Brahman. The middle exchange is compressed, and the contrast “of this kind, of another kind” is taken to express a changed experience of the fires. Speaker assignments make the dialogue readable but require review.
संदर्भ
आचार्य उपकोसल में परिवर्तन पहचानता है और उसके संकोची उत्तर से अग्नियों की शिक्षा सामने आती है।
Context
The teacher recognizes Upakosala’s change, and the student’s hesitant answer leads to the fires’ instruction being disclosed.