Passage 61.2
ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक्कला प्रतीची दिक्कला दक्षिणा दिक्कलोदीची दिक्कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[ऋषभः आह—] ब्रह्मणः च ते पादम् ब्रवाणि इति । [सत्यकामः आह—] भगवान् मे ब्रवीतु इति । [ऋषभः] तस्मै ह उवाच—प्राची दिक् कला [अस्ति]; प्रतीची दिक् कला [अस्ति]; दक्षिणा दिक् कला [अस्ति]; उदीची दिक् कला [अस्ति] । सोम्य, वै एषः ब्रह्मणः चतुष्कलः पादः प्रकाशवान् नाम [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
बैल ने कहा: “मैं तुम्हें ब्रह्म का एक पाद भी बताऊँ।” सत्यकाम ने कहा: “भगवन्, मुझे बताइए।” उसने कहा: “पूर्व दिशा एक कला है, पश्चिम दिशा एक कला है, दक्षिण दिशा एक कला है और उत्तर दिशा एक कला है। प्रिय, ब्रह्म का यह चार कलाओं वाला पाद प्रकाशवान् कहलाता है।”
English meaning
The bull said, “Let me also tell you one quarter of Brahman.” Satyakāma replied, “Please tell me, sir.” It said, “The eastern direction is one part, the western direction one part, the southern direction one part, and the northern direction one part. Dear one, this four-part quarter of Brahman is called Radiant.”
व्याख्या
पाद यहाँ चौथाई विभाग है और कला उसके भीतर का अंश। चार दिशाएँ प्रकाशवान् नामक पाद बनाती हैं। यह ध्यान के लिए बनाया गया विन्यास है, ब्रह्म को वस्तु की तरह काटकर चार भौतिक टुकड़े करना नहीं।
Explanation
Pāda is a quarter and kalā a component within it. Four directions form the quarter named Radiant. This is an arrangement for contemplation, not a physical division of Brahman into pieces.
संदर्भ
सत्यकाम को चार क्रमिक उपदेशों में मिलने वाले ब्रह्म-चिन्तन का पहला पाद बताया जाता है।
Context
This is the first of four teachings through which Satyakāma learns to contemplate Brahman.