Passage 55.4
प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
प्राणः एव ब्रह्मणः चतुर्थः पादः [अस्ति] । सः वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च । यः एवम् वेद, [सः] कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन भाति च तपति च ।
हिन्दी अर्थ
प्राण ब्रह्म का एक चौथाई पाद है। वह वायु की ज्योति से चमकता और तपता है। जो इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मवर्चस् से चमकता और तपता है।
English meaning
Breath is one quarter of Brahman. Through the light of wind it shines and gives warmth. One who knows this shines and gives warmth through renown, fame and sacred radiance.
व्याख्या
चतुर्थः पादः हर बार एक चौथाई का अर्थ देता है, सूची का केवल चौथा सदस्य नहीं। भाति और तपति दोनों क्रियाएँ पहले देवतामय प्रकाश और फिर ज्ञाता की कीर्ति, यश तथा ब्रह्मवर्चस् पर लागू हैं। ब्रह्मवर्चस् वैदिक ज्ञान या साधना की दीप्ति है।
Explanation
Caturthaḥ pādaḥ means a one-fourth share in each instance, not exclusively the fourth item in the list. Both shining and giving warmth are applied first to the cosmic light and then to the knower’s renown, fame and sacred radiance. Brahmavarcasa is the distinction or radiance associated with sacred learning and practice.
संदर्भ
चार आन्तरिक-बाह्य युग्मों में अब प्राण और वायु का सम्बन्ध तथा उसका फल स्पष्ट होता है।
Context
The pairing of breath with wind, and its contemplative result, is now made explicit.