Passage 36.3
तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक्संतृण्णोंकार एवेदꣳसर्वमोंकार एवेदꣳ सर्वम् ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तानि अभ्यतपत् । अभितप्तेभ्यः तेभ्यः ॐकारः संप्रास्रवत् । तत् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णानि [सन्ति], एवम् ॐकारेण सर्वा वाक् संतृण्णा [अस्ति] । ॐकारः एव इदम् सर्वम् [अस्ति]; ॐकारः एव इदम् सर्वम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने उन अक्षरों पर तप किया। उनसे ओंकार प्रवाहित हुआ। जैसे डंठल से सभी पत्ते जुड़े रहते हैं, वैसे ही ओंकार से सारी वाणी जुड़ी है। ओंकार ही यह सब है; ओंकार ही यह सब है।
English meaning
He applied that heat to those utterances, and OM flowed forth from them. Just as all leaves are held together by a stalk, all speech is held together by OM. OM alone is all this; OM alone is all this.
व्याख्या
शङ्कु का सामान्य अर्थ कील या नुकीला आधार भी है; यहाँ वनस्पति-सन्दर्भ में डंठल लिया गया है। सन्तृण्ण का बिम्ब आर-पार जुड़ने या धारण किए रहने का है; समापन का दोहरा कथन सुरक्षित है।
Explanation
Śaṅku can mean a peg or pointed support; a stalk is chosen in this botanical image. Santṛṇṇa evokes being threaded through or held together, and the doubled concluding assertion is preserved.
संदर्भ
धर्म के तीन आधारों की चर्चा के बाद पाठ लोकों, वेदों और व्याहृतियों का सार ओम् में संकेन्द्रित करता है।
Context
After describing three supports of religious life, the text concentrates the worlds, Vedic learning and sacred utterances into OM.