Passage 150.2
स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳ ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति स होवाच नाह खल्वयं भगव एवꣳ संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः समित्पाणिः पुनः एयाय । प्रजापतिः तम् ह उवाच—मघवन्, यत् शान्तहृदयः प्राव्राजीः, किम् इच्छन् पुनः आगमः इति । सः ह उवाच—भगवः, अयम् ह खलु एवम् सम्प्रति अयम् अहम् अस्मि इति आत्मानम् न जानाति; इमानि भूतानि उ एव न [जानाति] । विनाशम् एव अपीतः भवति; अहम् अत्र भोग्यम् न पश्यामि इति ।
हिन्दी अर्थ
वह समिधाएँ हाथ में लिए फिर आया। प्रजापति ने पूछा, “मघवन्, तुम सन्तुष्ट मन से गए थे; अब किसकी इच्छा से लौटे हो?” उसने कहा, “भगवन्, इस दशा में वह अपने को भी ‘यह मैं हूँ’ कहकर नहीं जानता और न इन प्राणियों को जानता है। वह मानो विनाश में ही लीन हो जाता है। मुझे इसमें कोई कल्याणकारी उपलब्धि नहीं दिखती।”
English meaning
He returned with fuel sticks in his hand. Prajāpati asked, “Maghavan, you left content at heart. What do you desire that has brought you back?” He answered, “Sir, in this condition he does not recognize even himself as ‘This is I,’ nor does he know these beings. He seems to have passed into destruction itself. I see no worthwhile fulfillment in this.”
व्याख्या
बार-बार लौटने की संरचना ज्ञान को परीक्षा और संशोधन से जोड़ती है। इस बार का विषय शरीर की चोट या स्वप्न का भय नहीं, अनुभव की पहचान का अभाव है।
Explanation
The repeated return connects knowledge with testing and revision. This objection concerns neither bodily injury nor dream fear but the absence of recognizable experience.
संदर्भ
इन्द्र निद्रा की आपत्ति भी गुरु से छिपाते नहीं, बल्कि फिर विद्यार्थी बनकर लौटते हैं।
Context
Indra brings the sleep objection back to the teacher, returning once more as a student.