Passage 143.2
तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तस्मात् वै एतम् सेतुम् तीर्त्वा अन्धः सन् अनन्धः भवति, विद्धः सन् अविद्धः भवति, उपतापी सन् अनुपतापी भवति । तस्मात् वै एतम् सेतुम् तीर्त्वा अपि नक्तम् अहर् एव अभिनिष्पद्यते; हि एषः ब्रह्मलोकः सकृद्विभातः एव [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
इसलिए इस सेतु को पार करके अन्धा व्यक्ति अनन्ध हो जाता है, घायल व्यक्ति अघायल हो जाता है और पीड़ित व्यक्ति पीड़ारहित हो जाता है। इस सेतु को पार करने पर रात में भी दिन ही प्रकट होता है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सदा प्रकाशमान है।
English meaning
Crossing this bridge, one who was blind is no longer blind, one who was wounded is no longer wounded, and one who suffered is free from suffering. After crossing it, even night becomes day, for this world of Brahman shines without interruption.
व्याख्या
यह मुक्ति सम्बन्धी धार्मिक चित्र है, अन्धता या बीमारी के लिए उपचार का दावा नहीं। सकृद्विभात को एक बार प्रकट होकर निरन्तर प्रकाशित रहने के अर्थ में लिया गया है।
Explanation
This is a religious picture of liberation, not a claim to treat blindness or illness. Sakṛdvibhāta is understood as shining once for all and hence without interruption.
संदर्भ
सेतु के पार की दशा को तीन दुःख-निवृत्तियों और निरन्तर प्रकाश से दिखाया जाता है।
Context
Three reversals of suffering and uninterrupted light depict the state beyond the bridge.