Passage 107.3
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[पिता], सः यः एषः अणिमा [अस्ति], इदम् सर्वम् एतदात्म्यम् [अस्ति]; तत् सत्यम् [अस्ति]; सः आत्मा [अस्ति]; श्वेतकेतो, तत् त्वम् असि इति [उवाच] । [सः], भगवान् मा भूयः एव विज्ञापयतु इति [उवाच] । [पिता], तथा, सोम्य इति ह उवाच ।
हिन्दी अर्थ
“वह जो यह सूक्ष्म सार है, इस सबका आत्मा वही है। वही सत्य है, वही आत्मा है। श्वेतकेतु, वह तुम हो।” श्वेतकेतु ने कहा, “भगवन्, मुझे और समझाइए।” उन्होंने कहा, “ऐसा ही होगा, प्रिय।”
English meaning
“That subtle essence: all this has that as its self. That is the real; that is the self. You are that, Śvetaketu.” Śvetaketu said, “Please, sir, make me understand further.” He replied, “So I shall, my dear.”
व्याख्या
रूपों की अनेकता और उनके आधार की एकता को उपमा साथ रखती है। इससे सम्बन्ध का दार्शनिक स्वरूप समझने की आवश्यकता समाप्त नहीं होती, इसलिए शिष्य फिर पूछता है।
Explanation
The image holds together the multiplicity of forms and unity of their ground. It does not remove the need to understand the philosophical character of that relation, so the pupil asks again.
संदर्भ
नदी और समुद्र की शिक्षा फिर श्वेतकेतु के आत्मा तक लाई जाती है।
Context
The river-and-sea teaching is brought back to Śvetaketu’s self.