Passage 107.2
एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिँहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दँशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
एवम् एव खलु सोम्य इमाः सर्वाः प्रजाः सतः आगम्य, सतः आगच्छामहे इति न विदुः । ते इह व्याघ्रः वा सिंहः वा वृकः वा वराहः वा कीटः वा पतङ्गः वा दंशः वा मशकः वा यत् यत् भवन्ति, तत् आभवन्ति ।
हिन्दी अर्थ
“ठीक वैसे ही, प्रिय, ये सभी प्रजाएँ सत् से आकर यह नहीं जानतीं कि ‘हम सत् से आई हैं।’ यहाँ वे जो-जो होती हैं, बाघ, सिंह, भेड़िया, वराह, कीड़ा, उड़ने वाला कीट, डाँस या मच्छर, वे फिर वही हो जाती हैं।”
English meaning
“In just the same way, my dear, all these creatures, on coming from Being, do not know, ‘We have come from Being.’ Whatever they are here, a tiger, lion, wolf, boar, worm, flying insect, biting fly, or mosquito, they become that again.”
व्याख्या
पिछले खण्ड में सति सम्पद्य, सत् में पहुँचकर, कहा गया था; यहाँ सतः आगम्य, सत् से आकर, है। दोनों को एक जैसा अनुवाद नहीं किया गया। जीवों की पूरी सूची फिर आती है।
Explanation
The preceding section said sati sampadya, “having become united with Being”; here sataḥ āgamya means “having come from Being.” The two are not flattened into the same wording, and the full creature list is repeated.
संदर्भ
नदी की उपमा में सत् से आने और उस मूल को न जानने पर बल है।
Context
The river comparison emphasizes coming from Being without recognizing that origin.