Passage 106.2
ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यथा ते [रसाः] तत्र, अहम् अमुष्य वृक्षस्य रसः अस्मि; अहम् अमुष्य वृक्षस्य रसः अस्मि इति विवेकम् न लभन्ते, एवम् एव खलु सोम्य इमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य, सति सम्पद्यामहे इति न विदुः ।
हिन्दी अर्थ
“वहाँ वे रस यह भेद नहीं जान पाते कि ‘मैं इस वृक्ष का रस हूँ, मैं उस वृक्ष का रस हूँ।’ ठीक वैसे ही, प्रिय, ये सभी प्रजाएँ सत् में पहुँचकर यह नहीं जानतीं कि ‘हम सत् में पहुँच गई हैं।’”
English meaning
“There those juices cannot distinguish, ‘I am the juice of this tree; I am the juice of that tree.’ In just the same way, my dear, all these creatures, on becoming united with Being, do not know, ‘We have become united with Being.’”
व्याख्या
न विदुः अनुभव के सचेत ज्ञान के अभाव को बताता है। केवल सत् में मिलना और उस सम्बन्ध को जानना एक बात नहीं मान लिए गए हैं। नींद की पिछली चर्चा इस भेद की पृष्ठभूमि है।
Explanation
Na viduḥ marks the absence of conscious knowledge. Becoming united with Being is not simply equated with knowing that relation. The preceding account of sleep supplies a background for the distinction.
संदर्भ
मधु में अलग वृक्ष की पहचान न होना सत् में मिलन की अनजानी अवस्था से जोड़ा जाता है।
Context
The lack of separate tree-identification in honey is compared with unrecognized union with Being.