Passage 94.2
अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति; वाचि तृप्यन्त्याम् अग्निः तृप्यति; अग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति; पृथिव्याम् तृप्यन्त्याम् पृथिवी च अग्निः च यत् किञ्च अधितिष्ठतः, तत् तृप्यति । तस्य तृप्तिम् अनु [सः] प्रजया पशुभिः अन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेन तृप्यति इति ।
हिन्दी अर्थ
अपान के तृप्त होने पर वाणी को तृप्ति मिलती है; वाणी की तृप्ति पर अग्नि को तृप्ति मिलती है; अग्नि की तृप्ति पर पृथ्वी को तृप्ति मिलती है। पृथ्वी की तृप्ति होने पर जिस किसी पर पृथ्वी और अग्नि अधिष्ठित हैं, वह सब तृप्त होता है। उसकी तृप्ति के साथ उपासक सन्तान, पशुओं, अन्न-भोग, तेज और वैदिक विद्या के तेज से तृप्त होता है।
English meaning
When apāna is satisfied, speech is satisfied; when speech is satisfied, fire is satisfied; when fire is satisfied, earth is satisfied. When earth is satisfied, everything over which earth and fire preside is satisfied. Following that satisfaction, the contemplator is satisfied with offspring, livestock, the enjoyment of food, radiance, and the radiance of sacred learning.
व्याख्या
अपान, वाणी, अग्नि और पृथ्वी इस पद की विशिष्ट कड़ी हैं। अन्त में पाँच फल अलग हैं; तेज और ब्रह्मवर्चस् समानार्थी मानकर एक नहीं किए गए हैं। यह उपासना की विश्व-शरीर समानता है, शारीरिक क्रिया का वैज्ञानिक मानचित्र नहीं।
Explanation
Apāna, speech, fire and earth form this passage’s distinctive sequence. Five results follow; radiance and the radiance of sacred learning are not treated as identical. These are contemplative body–cosmos correspondences, not a scientific map of physiology.
संदर्भ
अपान की आहुति वाणी, अग्नि और पृथ्वी की शृंखला में फलित होती है।
Context
The apāna offering unfolds through speech, fire and earth.