Passage 92.2
प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किञ्च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥२॥
पदच्छेद
अन्वय
प्राणे तृप्यति चक्षुः तृप्यति; चक्षुषि तृप्यति आदित्यः तृप्यति; आदित्ये तृप्यति द्यौः तृप्यति; दिवि तृप्यन्त्याम् द्यौः च आदित्यः च यत् किञ्च अधितिष्ठतः, तत् तृप्यति । तस्य तृप्तिम् अनु [सः] प्रजया पशुभिः अन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेन तृप्यति इति ।
हिन्दी अर्थ
प्राण के तृप्त होने पर चक्षु को तृप्ति मिलती है; चक्षु की तृप्ति पर आदित्य को तृप्ति मिलती है; आदित्य की तृप्ति पर द्युलोक को तृप्ति मिलती है। द्युलोक की तृप्ति होने पर जिस किसी पर द्युलोक और आदित्य अधिष्ठित हैं, वह सब तृप्त होता है। उसकी तृप्ति के साथ उपासक सन्तान, पशुओं, अन्न-भोग, तेज और वैदिक विद्या के तेज से तृप्त होता है।
English meaning
When prāṇa is satisfied, the eye is satisfied; when the eye is satisfied, the sun is satisfied; when the sun is satisfied, heaven is satisfied. When heaven is satisfied, everything over which heaven and the sun preside is satisfied. Following that satisfaction, the contemplator is satisfied with offspring, livestock, the enjoyment of food, radiance, and the radiance of sacred learning.
व्याख्या
प्राण, चक्षु, आदित्य और द्युलोक इस पद की विशिष्ट कड़ी हैं। अन्त में पाँच फल अलग हैं; तेज और ब्रह्मवर्चस् समानार्थी मानकर एक नहीं किए गए हैं। यह उपासना की विश्व-शरीर समानता है, शारीरिक क्रिया का वैज्ञानिक मानचित्र नहीं।
Explanation
Prāṇa, the eye, the sun and heaven form this passage’s distinctive sequence. Five results follow; radiance and the radiance of sacred learning are not treated as identical. These are contemplative body–cosmos correspondences, not a scientific map of physiology.
संदर्भ
दृष्टि और सूर्य के सम्बन्ध से प्राण की तृप्ति द्युलोक तक पहुँचती है।
Context
The relation of sight to the sun carries prāṇa’s satisfaction to heaven.