Passage 90.2
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[त्वम्] अन्नम् अत्सि, प्रियम् पश्यसि । यः एतम् आत्मानम् वैश्वानरम् एवम् उपास्ते, [सः] अन्नम् अत्ति, प्रियम् पश्यति; अस्य कुले ब्रह्मवर्चसम् भवति । एतौ तु आत्मनः पादौ [स्तः]; यत् माम् न आगमिष्यः, ते पादौ व्यम्लास्येताम् इति ह उवाच ।
हिन्दी अर्थ
तुम अन्न खाते हो और प्रिय वस्तु देखते हो। जो इस वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है, वह अन्न खाता है, प्रिय वस्तु देखता है और उसके कुल में वैदिक विद्या का तेज होता है। राजा ने कहा, “किन्तु ये आत्मा के दो पैर ही हैं। यदि तुम मेरे पास न आए होते, तो तुम्हारे पैर शिथिल हो जाते।”
English meaning
You eat food and see what is dear. Whoever contemplates this Vaiśvānara self in this way eats food, sees what is dear, and has the radiance of sacred learning in the family. The king said, “But these are only the self’s two feet. Had you not come to me, your feet would have withered.”
व्याख्या
दो पैरों का द्विवचन स्पष्ट है। निष्कर्ष यह नहीं कि पृथ्वी की उपासना व्यर्थ थी, बल्कि यह कि उस आधार को सम्पूर्ण आत्मा मानना अपूर्ण था। शिथिलता की चेतावनी कथा का प्रतिकल्पित कथन है।
Explanation
The dual explicitly identifies two feet. The conclusion is not that contemplating earth was worthless, but that mistaking this support for the entire self was incomplete. The warning about withering is counterfactual narrative.
संदर्भ
पृथ्वी की प्रतिष्ठा को सम्पूर्ण वैश्वानर के पैरों में स्थान मिलता है।
Context
Earth’s supporting role is assigned to the feet of the complete Vaiśvānara.