Passage 33.2
स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाꣳसलोकताꣳसर्ष्टिताꣳसायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः एवम् देवतासु प्रोतम् एतत् राजनम् वेद, [सः] एतासाम् एव देवतानाम् सलोकताम् सर्ष्टिताम् सायुज्यम् गच्छति, सर्वम् आयुः एति, ज्योक् जीवति, प्रजया पशुभिः महान् भवति, कीर्त्या महान् [भवति] । ब्राह्मणान् न निन्देत्; तत् व्रतम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जो इस राजन साम को इस प्रकार देवताओं में गुँथा हुआ जानता है, वह उन्हीं देवताओं के समान लोक, समान ऐश्वर्य और उनके साथ संयुक्तता प्राप्त करता है। वह सम्पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, सन्तान और पशुओं से महान् तथा कीर्ति से महान् होता है। वह ब्राह्मणों की निन्दा न करे; यही उसका व्रत है।
English meaning
One who knows this Rājana Sāman as woven through the deities attains residence in their world, participation in their prosperity, and union with them. He reaches his full span of life, lives long, and becomes great through offspring and livestock, and great in renown. He should not revile Brahmins; this is his observance.
व्याख्या
सलोकता, सर्ष्टिता और सायुज्य तीन पृथक् सम्बन्ध हैं; उन्हें एक ही अस्पष्ट मुक्ति शब्द में नहीं मिलाया गया। अन्तिम व्रत ऐतिहासिक सामाजिक-अनुष्ठानिक परिवेश का कथन है।
Explanation
Salokatā, sarṣṭitā and sāyujya name distinct relationships, not one undifferentiated idea of liberation. The final observance is reported within its historical social and ritual setting.
संदर्भ
राजन साम को अग्नि, वायु और आकाशीय देवताओं से सम्बन्धित किया जाता है।
Context
The Rājana Sāman is correlated with fire, wind and the celestial deities.