Passage 29.2
स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यर्तून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः एवम् ऋतुषु प्रोतम् एतत् वैराजम् वेद, [सः] प्रजया पशुभिः ब्रह्मवर्चसेन विराजति, सर्वम् आयुः एति, ज्योक् जीवति, प्रजया पशुभिः महान् भवति, कीर्त्या महान् [भवति] । ऋतून् न निन्देत्; तत् व्रतम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जो इस वैराज साम को इस प्रकार ऋतुओं में गुँथा हुआ जानता है, वह सन्तान, पशुधन और वेदविद्या के तेज से शोभित होता है। वह सम्पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, सन्तान और पशुओं से महान् तथा कीर्ति से महान् होता है। वह ऋतुओं की निन्दा न करे; यही उसका व्रत है।
English meaning
One who knows this Vairāja Sāman as woven through the seasons shines through offspring, livestock and the lustre of sacred learning. He reaches his full span of life, lives long, and becomes great through offspring and livestock, and great in renown. He should not revile the seasons; this is his observance.
व्याख्या
वैराज और विराजति में शब्द-साम्य है। फलवाक्य में सन्तान और पशुधन का दो बार उल्लेख मूल पाठ में है, अनुवाद में उसे हटाया नहीं गया।
Explanation
Vairāja is linked verbally with virājati, “shines.” Offspring and livestock occur twice in the source’s promise, and the translation retains that repetition.
संदर्भ
वैराज साम को ऋतुचक्र में गुँथा हुआ बताया जाता है।
Context
The Vairāja Sāman is described as woven through the seasonal cycle.