Passage 28.2
स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाꣳश्च सुरूपाꣳश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः एवम् पर्जन्ये प्रोतम् एतत् वैरूपम् वेद, [सः] विरूपान् च सुरूपान् च पशून् अवरुन्धे, सर्वम् आयुः एति, ज्योक् जीवति, प्रजया पशुभिः महान् भवति, कीर्त्या महान् [भवति] । वर्षन्तम् न निन्देत्; तत् व्रतम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जो इस वैरूप साम को इस प्रकार पर्जन्य में गुँथा हुआ जानता है, वह विविध रूप वाले और सुन्दर रूप वाले पशु प्राप्त करता है। वह सम्पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, सन्तान और पशुओं से महान् तथा कीर्ति से महान् होता है। वह वर्षा करते पर्जन्य की निन्दा न करे; यही उसका व्रत है।
English meaning
One who knows this Vairūpa Sāman as woven into Parjanya obtains animals of varied forms and of beautiful forms. He reaches his full span of life, lives long, and becomes great through offspring and livestock, and great in renown. He should not revile Parjanya when it rains; this is his observance.
व्याख्या
विरूपान् का अर्थ विविध रूप वाले भी हो सकता है, केवल कुरूप नहीं। साम के वैरूप नाम और पशुओं की रूप-विविधता में सम्बन्ध है।
Explanation
Virūpān can mean variously formed, not only ugly. The name Vairūpa is associated with the diversity of animal forms.
संदर्भ
वैरूप साम का आधार पर्जन्य और वर्षा की प्रक्रिया है।
Context
The Vairūpa Sāman is grounded in the rain-bearing power and the process of rainfall.