Passage 27.2
स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः एवम् आदित्ये प्रोतम् एतत् बृहत् वेद, [सः] तेजस्वी अन्नादः भवति, सर्वम् आयुः एति, ज्योक् जीवति, प्रजया पशुभिः महान् भवति, कीर्त्या महान् [भवति] । तपन्तम् न निन्देत्; तत् व्रतम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जो इस बृहत् साम को इस प्रकार आदित्य में गुँथा हुआ जानता है, वह तेजस्वी और अन्न का भोक्ता होता है। वह सम्पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, सन्तान और पशुओं से महान् तथा कीर्ति से महान् होता है। वह तपते सूर्य की निन्दा न करे; यही उसका व्रत है।
English meaning
One who knows this Bṛhat Sāman as woven into the sun becomes radiant and an eater of food. He reaches his full span of life, lives long, and becomes great through offspring and livestock, and great in renown. He should not revile the scorching sun; this is his observance.
व्याख्या
तपन्तम् का कर्म आदित्य है, जो प्रसंग से आता है। नियम अपने ध्यान-विषय के प्रति अनादर न करने का है।
Explanation
The object of tapantam is the sun, supplied from the context. The observance asks the contemplator not to disparage the focus of contemplation.
संदर्भ
बृहत् साम को सूर्य के उदय, मध्याह्न और अस्त की पाँच अवस्थाओं में गुँथा हुआ बताया जाता है।
Context
The Bṛhat Sāman is described as woven into five phases of the sun’s daily course.