Passage 26.2
स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः एवम् मिथुने प्रोतम् एतत् वामदेव्यम् वेद, [सः] मिथुनीभवति, मिथुनात् मिथुनात् प्रजायते, सर्वम् आयुः एति, ज्योक् जीवति, प्रजया पशुभिः महान् भवति, कीर्त्या महान् [भवति] । काञ्चन न परिहरेत्; तत् व्रतम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जो इस वामदेव्य साम को इस प्रकार युगल-मिलन में गुँथा हुआ जानता है, वह साथी से युक्त होता है और प्रत्येक मिलन से सन्तान प्राप्त करता है। वह सम्पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, दीर्घकाल तक जीवित रहता है, सन्तान और पशुओं से महान् तथा कीर्ति से महान् होता है। वह किसी स्त्री को अस्वीकार न करे; यही इस उपासना का व्रत है।
English meaning
One who knows this Vāmadevya Sāman as woven into the union of a couple gains a partner and offspring from each union. He reaches his full span of life, lives long, and becomes great through offspring and livestock, and great in renown. He should turn away no woman; this is the observance of this contemplation.
व्याख्या
अन्तिम नियम प्राचीन अनुष्ठानिक प्रसंग का कथन है, आज के पाठक के लिए सार्वभौम यौन-आचरण का निर्देश नहीं। भाष्य इसे स्वयं मिलन की इच्छुक होकर आए व्यक्ति के सन्दर्भ में समझता है; स्पष्ट सहमति और व्यक्तिगत सीमाएँ अनिवार्य हैं।
Explanation
The final rule is reported within an ancient ritual setting, not offered as a universal sexual directive today. The commentary construes it in relation to a woman who approaches seeking union; consent and personal boundaries remain essential.
संदर्भ
वामदेव्य साम को स्त्री-पुरुष के मिलन की क्रमिक अवस्थाओं से जोड़ा गया है। यह प्राचीन अनुष्ठानिक प्रतीक-विधान है।
Context
The Vāmadevya Sāman is correlated with stages of sexual union. This is an ancient ritual system of correspondences.