Passage 126.2
स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः स्मरम् ब्रह्म इति उपास्ते, यावत् स्मरस्य गतम् [अस्ति], तत्र अस्य यथाकामचारः भवति—यः स्मरम् ब्रह्म इति उपास्ते । [नारदः], भगवः, स्मरात् भूयः अस्ति इति [पप्रच्छ] । [सनत्कुमारः], स्मरात् वाव भूयः अस्ति इति [उवाच] । [नारदः], तत् मे भगवान् ब्रवीतु इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
जो स्मरण को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, स्मरण की जहाँ तक पहुँच है, वहाँ वह अपनी इच्छा के अनुसार विचरण कर सकता है; यह उस व्यक्ति के लिए है जो स्मरण को ब्रह्म मानकर उपासना करता है। नारद ने पूछा: “भगवन्, क्या स्मरण से भी बढ़कर कुछ है?” उत्तर मिला: “हाँ, स्मरण से बढ़कर कुछ है।” नारद ने कहा: “भगवन्, वह मुझे बताइए।”
English meaning
One who contemplates memory as brahman has freedom to move as desired wherever memory extends. This applies to one who contemplates memory as brahman. Nārada asked, “Sir, is there anything greater than memory?” The answer was, “Indeed, there is something greater than memory.” Nārada said, “Sir, please tell me of it.”
व्याख्या
स्मृति के क्षेत्र तक स्वतंत्रता मिलना उपयोगी फल है, पर यहाँ वह भी सीमित है। अगली आशा-विद्या स्मरण को भविष्य की अपेक्षा से जोड़ती है।
Explanation
Freedom within memory’s reach is a meaningful but bounded result. The following teaching on hope connects remembering with expectation directed toward the future.
संदर्भ
स्मरण की उपासना के बाद नारद उसके प्रेरक आधार की खोज जारी रखते हैं।
Context
After contemplating memory, Nārada continues toward what motivates it.