Passage 125.2
स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इति आकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः आकाशम् ब्रह्म इति उपास्ते, सः आकाशवतः प्रकाशवतः असम्बाधान् उरुगायवतः लोकान् वै अभिसिध्यति । यावत् आकाशस्य गतम् [अस्ति], तत्र अस्य यथाकामचारः भवति—यः आकाशम् ब्रह्म इति उपास्ते । [नारदः], भगवः, आकाशात् भूयः अस्ति इति [पप्रच्छ] । [सनत्कुमारः], आकाशात् वाव भूयः अस्ति इति [उवाच] । [नारदः], तत् मे भगवान् ब्रवीतु इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
जो आकाश को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह अवकाशयुक्त, प्रकाशयुक्त, संकुचनरहित और व्यापक गमन वाले लोकों को प्राप्त करता है। फिर आकाश की जहाँ तक पहुँच है, वहाँ वह अपनी इच्छा के अनुसार विचरण कर सकता है; यह उस व्यक्ति के लिए है जो आकाश को ब्रह्म मानकर उपासना करता है। नारद ने पूछा: “भगवन्, क्या आकाश से भी बढ़कर कुछ है?” उत्तर मिला: “हाँ, आकाश से बढ़कर कुछ है।” नारद ने कहा: “भगवन्, वह मुझे बताइए।”
English meaning
One who contemplates space as brahman reaches worlds full of space and light, unconstricted and affording wide scope. One then has freedom to move as desired wherever space extends. This applies to one who contemplates space as brahman. Nārada asked, “Sir, is there anything greater than space?” The answer was, “Indeed, there is something greater than space.” Nārada said, “Sir, please tell me of it.”
व्याख्या
असम्बाध और उरुगायवत् संकुचन के विपरीत व्यापक गमन का भाव देते हैं। अगली स्मृति-विद्या इस बाहरी अवकाश से समझ की आन्तरिक शर्त की ओर मुड़ती है।
Explanation
Asambādha and urugāyavat evoke unconstricted breadth and wide scope. The next teaching, on memory, turns from external openness to an internal condition of understanding.
संदर्भ
आकाश की उपासना का फल खुलापन, प्रकाश और निर्बाध विस्तार लिए हुए लोक हैं।
Context
The result of contemplating space is expressed through openness, light and unobstructed breadth.