Passage 119.2
स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद्भूय इति ध्यानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः ध्यानम् ब्रह्म इति उपास्ते, यावत् ध्यानस्य गतम् [अस्ति], तत्र अस्य यथाकामचारः भवति—यः ध्यानम् ब्रह्म इति उपास्ते । [नारदः], भगवः, ध्यानात् भूयः अस्ति इति [पप्रच्छ] । [सनत्कुमारः], ध्यानात् वाव भूयः अस्ति इति [उवाच] । [नारदः], तत् मे भगवान् ब्रवीतु इति [उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
जो ध्यान को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, ध्यान की जहाँ तक पहुँच है, वहाँ वह अपनी इच्छा के अनुसार विचरण कर सकता है; यह उस व्यक्ति के लिए है जो ध्यान को ब्रह्म मानकर उपासना करता है। नारद ने पूछा: “भगवन्, क्या ध्यान से भी बढ़कर कुछ है?” उत्तर मिला: “हाँ, ध्यान से बढ़कर कुछ है।” नारद ने कहा: “भगवन्, वह मुझे बताइए।”
English meaning
One who contemplates meditation as brahman has freedom to move as desired wherever meditation extends. This applies to one who contemplates meditation as brahman. Nārada asked, “Sir, is there anything greater than meditation?” The answer was, “Indeed, there is something greater than meditation.” Nārada said, “Sir, please tell me of it.”
व्याख्या
ध्यान महत्त्वपूर्ण होने पर भी इस संवाद में अन्तिम पद नहीं है। फल को ध्यान की पहुँच तक रखकर अगला चरण ज्ञान की स्पष्टता की ओर खुलता है।
Explanation
Meditation is important but not the final stage of this dialogue. Its bounded result opens the way toward a further form of discriminating knowledge.
संदर्भ
ध्यान की स्तुति के बाद नारद ध्यान से भी आगे पूछते हैं।
Context
After the praise of meditation, Nārada asks whether it too can be surpassed.