Shloka 18.71
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥१८-७१॥
पदच्छेद
श्रद्धावान्śraddhāvānअनसूयःanasūyaḥचcaशृणुयात्śṛṇuyātअपिapiयःyaḥनरःnaraḥसःsaḥअपिapiमुक्तःmuktaḥशुभान्śubhānलोकान्lokānप्राप्नुयात्prāpnuyātपुण्य-कर्मणाम्puṇya-karmaṇām
अन्वय
यः श्रद्धावान् अनसूयः च नरः अपि शृणुयात्, सः अपि मुक्तः [सन्] पुण्यकर्मणाम् शुभान् लोकान् प्राप्नुयात् ।
हिन्दी अर्थ
जो व्यक्ति श्रद्धा से, दोषदृष्टि के बिना इसे सुनेगा भी, वह मुक्त होकर पुण्यकर्म करने वालों के शुभ लोक प्राप्त करेगा।
English meaning
Even one who listens with faith and without fault-finding will be freed and reach the auspicious worlds of those who do good.
प्रसंग
अध्ययन करने वाले के बाद श्रद्धा से सुनने वाले को भी चर्चा में शामिल किया जाता है।
सरल व्याख्या
सुनने का साधारण दिखने वाला कार्य भी तुच्छ नहीं माना गया। यहाँ श्रद्धा और दोष न खोजने वाली ग्रहणशीलता पर बल है।
Context
After the student, even the person who listens faithfully is included.
Simple explanation
The apparently simple act of listening is not dismissed. Faith and receptive attention without fault-finding are emphasized.