Passage 24.6
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किंज्योतिरेवायं पुरुष इति । आत्मैवास्य ज्योतिर्भवतीति । आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[जनकः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, अस्तमिते आदित्ये चन्द्रमसि अस्तमिते शान्ते अग्नौ शान्तायाम् वाचि, अयम् पुरुषः किंज्योतिः एव [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] आत्मा एव अस्य ज्योतिः भवति इति । अयम् आत्मना एव ज्योतिषा आस्ते, पल्ययते, कर्म कुरुते, विपल्येति इति ।
हिन्दी अर्थ
जनक ने पूछा: सूर्य और चन्द्रमा अस्त हों, अग्नि बुझी हो और वाणी भी मौन हो, तब इस पुरुष की ज्योति क्या है? आत्मा ही उसकी ज्योति होता है। आत्मा के ही प्रकाश से वह बैठता है, बाहर जाता है, कर्म करता है और लौटता है।
English meaning
Janaka asked, “When sun and moon have set, fire is out and speech is silent, what is the person’s light?” “The Self itself. By the Self as light the person sits, goes out, acts and returns.”
व्याख्या
ज्योति अब जानने की आन्तरिक उपस्थिति है। इसका अर्थ आत्मा से दिखाई देने वाला भौतिक प्रकाश निकलना नहीं; अगला प्रश्न उसी आत्मा की पहचान पूछता है।
Explanation
Light now indicates the inward presence of knowing, not a physical beam emitted by the Self. The next question asks which Self is meant.
संदर्भ
बाहरी संकेत हट जाने पर आत्मा को ज्योति कहा जाता है।
Context
With external guides removed, the Self is called the light.