Passage 35.1
वाचं धेनुमुपासीत । तस्याश्चत्वारः स्तनाः । स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारः । तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति । स्वाहाकारं च वषट्कारं च । हन्तकारं मनुष्याः । स्वधाकारं पितरः । तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
वाचम् धेनुम् उपासीत । तस्याः चत्वारः स्तनाः [सन्ति]—स्वाहाकारः, वषट्कारः, हन्तकारः, स्वधाकारः । देवाः तस्यै द्वौ स्तनौ उपजीवन्ति—स्वाहाकारम् च वषट्कारम् च । मनुष्याः हन्तकारम् [उपजीवन्ति]; पितरः स्वधाकारम् [उपजीवन्ति] । तस्याः प्राणः ऋषभः [अस्ति]; मनः वत्सः [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
वाणी की उपासना दूध देने वाली गाय के रूप में करनी चाहिए। उसके चार थन हैं: स्वाहा का उच्चारण, वषट् का उच्चारण, हन्त का उच्चारण और स्वधा का उच्चारण। उसके दो थनों, स्वाहा और वषट् के उच्चारण, पर देवता जीवित रहते हैं। हन्त के उच्चारण पर मनुष्य और स्वधा के उच्चारण पर पितर जीवित रहते हैं। प्राण उसका साँड़ है और मन उसका बछड़ा है।
English meaning
One should contemplate speech as a milk-giving cow. It has four teats: the utterance svaha, the utterance vasat, the utterance hanta, and the utterance svadha. The gods live from two of its teats, the utterances svaha and vasat. Human beings live from hanta, and the ancestors from svadha. Breath is its bull, and mind its calf.
व्याख्या
चारों उच्चारण अलग रखे गए हैं: देवताओं के लिए दो, मनुष्यों के लिए हन्त और पितरों के लिए स्वधा। हन्त यहाँ प्रस्तुत करने या आमन्त्रित करने का उच्चारण है, मारने का आदेश नहीं। प्राण और मन को साँड़ और बछड़ा कहने से बोलने की जीवनशक्ति और उसकी मानसिक प्रेरणा इस रूपक में सम्मिलित होती हैं।
Explanation
The four utterances remain distinct: two for the gods, hanta for humans and svadha for ancestors. Hanta is an expression of offering or invitation here, not a command to kill. The bull and calf bring speech’s living power and mental prompting into the image.
संदर्भ
यह उपासना वाणी और यज्ञ में प्रयुक्त आह्वानों को पोषण देने वाली गाय के रूपक से जोड़ती है। देवता, मनुष्य और पितर उसके अलग उपभोक्ता हैं।
Context
This contemplation connects speech and ritual utterances with the nourishing cow. Gods, humans and ancestors are its distinct recipients.