Passage 24.36
स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाणिमानं निगच्छति । तद्यथाम्रं वोदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात्प्रमुच्यते । एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः संप्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यत्र अयम् अणिमानम् न्येति—जरया वा उपतपता वा अणिमानम् निगच्छति—तत् यथा आम्रम् वा उदुम्बरम् वा पिप्पलम् वा बन्धनात् प्रमुच्यते, एवम् एव अयम् पुरुषः एभ्यः अङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायम् प्रतियोनि प्राणाय एव आद्रवति ।
हिन्दी अर्थ
जब यह पुरुष वृद्धावस्था या रोग से क्षीणता को पहुँचता है, तब जैसे आम, उदुम्बर या पिप्पल का फल अपने बन्धन से छूटता है, वैसे ही वह इन अंगों से पूरी तरह छूटकर उलटे क्रम से अपने पूर्वस्थान, प्राण, की ओर जाता है।
English meaning
When this person becomes frail through old age or illness, then, as a mango, fig or pipal fruit is freed from its attachment, it becomes free of these limbs and returns by the reverse course to its former station, vital life.
व्याख्या
अणिमा यहाँ क्षीणता है, योगसिद्धि का अणिमा-पद नहीं। प्राण की ओर लौटना उपनिषद् की जीवन-यात्रा की भाषा है; रोग या वृद्धावस्था में देखभाल छोड़ने का संकेत नहीं।
Explanation
Anima here means wasting or frailty, not the yogic power of becoming minute. The return to vital life belongs to the text’s account of existence, not a reason to withhold care in illness or old age.
संदर्भ
देह से मुक्त होने को पके फल के डाली से छूटने जैसा कहा जाता है।
Context
Release from bodily limbs is likened to fruit loosening from its attachment.