Passage 23.1
जनको ह वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य । अनु मा शाधीति । स होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्मासि । एवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व गमिष्यसीति । नाहं तद्भगवन् वेद यत्र गमिष्यामीति । अथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति । ब्रवीतु भगवानिति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
जनकः ह वैदेहः कूर्चात् उपावसर्पन् उवाच—याज्ञवल्क्य, ते नमः अस्तु । मा अनु शाधि इति । सः ह उवाच—सम्राट्, यथा वै महान्तम् अध्वानम् एष्यन् [पुरुषः] रथम् वा नावम् वा समाददीत, एवम् एव एताभिः उपनिषद्भिः समाहितात्मा असि । एवम् वृन्दारकः आढ्यः सन् अधीतवेदः उक्तोपनिषत्कः इतः विमुच्यमानः क्व गमिष्यसि इति । [जनकः आह—] भगवन्, अहम् तत् न वेद, यत्र गमिष्यामि इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] अथ वै अहम् ते तत् वक्ष्यामि, यत्र गमिष्यसि इति । [जनकः आह—] भगवान् ब्रवीतु इति ।
हिन्दी अर्थ
विदेह के जनक अपने आसन से उतरकर पास आए और बोले: याज्ञवल्क्य, तुम्हें नमस्कार; मुझे शिक्षा दो। याज्ञवल्क्य ने कहा: सम्राट्, जैसे लम्बी यात्रा पर जाने वाला रथ या नाव जुटाता है, वैसे ही इन उपनिषद्-शिक्षाओं से तुम तैयार हो। इतने प्रतिष्ठित, समृद्ध, वेदपढ़े और उपनिषद् सुने हुए होकर यहाँ से मुक्त होने पर कहाँ जाओगे? जनक ने कहा: भगवन्, मैं नहीं जानता कि कहाँ जाऊँगा। तब याज्ञवल्क्य ने कहा: मैं तुम्हें बताऊँगा कि कहाँ जाओगे। जनक बोले: भगवान् बताएं।
English meaning
Janaka of Videha came down from his seat and approached: “Homage to you, Yajnavalkya. Instruct me.” Yajnavalkya said, “Your Majesty, as someone preparing for a long journey equips a chariot or a boat, so you have equipped yourself with these Upanishadic teachings. Being eminent and wealthy, having studied the Veda and heard these teachings, where will you go when released from here?” “Revered one, I do not know where I shall go.” “Then I shall tell you where you will go.” “Please tell me.”
व्याख्या
रथ और नाव की तैयारी उपदेशों का संग्रह है, यात्रा का गन्तव्य जान लेना नहीं। जनक अपनी विद्वत्ता के बावजूद अंतिम प्रश्न पर अज्ञान स्वीकारते हैं।
Explanation
Equipping the vehicle represents acquiring teachings, not yet knowing the journey’s destination. Janaka acknowledges uncertainty despite his learning and status.
संदर्भ
राजा बाहरी प्रतिष्ठा से हटकर शिष्य की भूमिका अपनाते हैं।
Context
The king moves from outward status into the role of a student.