Passage 38.1
एतद्वै परमं तपो यद्व्याहितस्तप्यते । परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद । एतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति । परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद । एतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति । परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यत् व्याहितः तप्यते, एतत् वै परमम् तपः [अस्ति] । यः एवम् वेद, [सः] परमम् ह एव लोकम् जयति । यम् प्रेतम् अरण्यम् हरन्ति, एतत् वै परमम् तपः [अस्ति] । यः एवम् वेद, [सः] परमम् ह एव लोकम् जयति । यम् प्रेतम् अग्नौ अभ्यादधति, एतत् वै परमम् तपः [अस्ति] । यः एवम् वेद, [सः] परमम् ह एव लोकम् जयति ।
हिन्दी अर्थ
पाठ कहता है: रोग से पीड़ित होकर जो तपता या कष्ट सहता है, वही परम तप है; जो इस प्रकार जानता है, वह परम लोक को जीतता है। मृत व्यक्ति को वन में ले जाना वही परम तप है; जो इस प्रकार जानता है, वह परम लोक को जीतता है। मृत व्यक्ति को अग्नि पर रखना वही परम तप है; जो इस प्रकार जानता है, वह परम लोक को जीतता है।
English meaning
The text declares: suffering or burning with illness is the highest austerity; one who knows in this way wins the highest world. Being carried to the forest after death is the highest austerity; one who knows in this way wins the highest world. Being placed on the fire after death is the highest austerity; one who knows in this way wins the highest world.
व्याख्या
तप का ताप और कठिन अनुभव से जुड़ा अर्थ यहाँ निर्णायक है। पाठ अनचाहे कष्ट तथा अन्त्येष्टि को धार्मिक अर्थ देता है; वह रोग उत्पन्न करने, उपचार छोड़ने या किसी जीवित व्यक्ति को अग्नि में रखने का निर्देश नहीं है। प्रेतम् दोनों अन्त्येष्टि-वाक्यों में मृत व्यक्ति है।
Explanation
The connection of tapas with heat and hardship is central. The text gives religious meaning to involuntary suffering and funeral rites; it does not direct anyone to induce illness, forgo treatment, or place a living person in fire. Pretam denotes someone already dead in both funeral statements.
संदर्भ
परलोक के वर्णन के बाद रोग, मृत्यु के बाद वन में ले जाने और दाह को तप के रूप में देखने की तीन समानान्तर घोषणाएँ आती हैं।
Context
After the account of an afterlife, three parallel declarations interpret illness, being carried to the forest after death, and cremation as austerity.