Passage 45.1
स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहमुपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति संभृत्य परिसमुह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यं संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थं संनीय जुहोति यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान् । तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा । या तिरश्ची निपद्यसेऽहं विधरणी इति । तां त्वा घृतस्य धारया यजे संराधनीमहं स्वाहा ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यः महत् प्राप्नुयाम् इति कामयेत, [सः] उदगयने आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहम् उपसद्व्रती भूत्वा औदुम्बरे कंसे चमसे वा सर्वौषधम् फलानि इति सम्भृत्य परिसमुह्य परिलिप्य अग्निम् उपसमाधाय परिस्तीर्य आवृता आज्यम् संस्कृत्य पुंसा नक्षत्रेण मन्थम् संनीय जुहोति—जातवेदः, त्वयि यावन्तः तिर्यञ्चः देवाः पुरुषस्य कामान् घ्नन्ति, तेभ्यः अहम् भागधेयम् जुहोमि; ते तृप्ताः मा सर्वैः कामैः तर्पयन्तु, स्वाहा । या अहम् विधरणी इति तिरश्ची निपद्यसे, ताम् त्वा संराधनीम् अहम् घृतस्य धारया यजे, स्वाहा ।
हिन्दी अर्थ
प्राचीन विधि कहती है: जो “मैं महानता प्राप्त करूँ” ऐसी कामना करे, वह उत्तरायण में बढ़ते पक्ष के पुण्य दिन, बारह दिन उपसद्-व्रत करने के बाद, उदुम्बर-काष्ठ के कटोरे या चमस में सभी प्रकार की औषधियाँ और फल एकत्र करे; स्थान को झाड़े, लीपे, अग्नि स्थापित करे, चारों ओर बिछावन दे और विधिपूर्वक घी तैयार करे। पुरुष-संज्ञक नक्षत्र के समय मन्थ मिलाकर आहुति दे: “हे जातवेदस्, तुममें जितने देव तिरछे होकर मनुष्य की कामनाओं को रोकते हैं, उन्हें मैं उनका अंश अर्पित करता हूँ। वे तृप्त होकर मुझे सभी कामनाओं से तृप्त करें, स्वाहा। जो तुम ‘मैं रोकने वाली हूँ’ कहकर आड़ी लेटती हो, उसी तुम्हें मैं घृत की धारा से प्रसन्न कर, सफल करने वाली के रूप में यजता हूँ, स्वाहा।”
English meaning
The ancient rite says that one desiring “May I attain greatness” should, on an auspicious day of the waxing fortnight during the sun’s northern course, after twelve days of the Upasad observance, collect herbs of every kind and fruits in an udumbara-wood bowl or cup; sweep and plaster the place, establish the fire, spread the surrounding litter and prepare clarified butter in the prescribed manner. Under a masculine-designated lunar mansion, the person mixes the mash and offers: “O Jatavedas, to all the gods within you who crosswise obstruct a person’s desires, I offer their allotted portion. Satisfied, may they satisfy me with every desire, svaha. You who lie across the way saying, ‘I am the obstructer,’ I worship you with a stream of clarified butter as the bringer of success, svaha.”
व्याख्या
मन्थ मिश्रित खाद्य-पेय है। दोनों मन्त्र बाधा को अंश देकर अनुकूलता में बदलने की यज्ञ-कल्पना रखते हैं। तिथि, व्रत, पात्र और अग्नि-तैयारी ऐतिहासिक अनुष्ठान के अंग हैं, सफलता पाने की वर्तमान सलाह नहीं।
Explanation
Mantha is a mixed food or drink. Both formulas imagine turning obstruction into favor by assigning it a sacrificial share. The timing, observance, vessels and fire preparation belong to a historical rite, not present-day advice for achieving success.
संदर्भ
प्राण की प्रधानता और अग्नियों की विद्या के बाद महानता चाहने वाले के लिए मन्थ-अनुष्ठान आता है।
Context
After the pre-eminence of breath and the teaching of the fires comes the mash rite for one seeking greatness.