Passage 24.5
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किंज्योतिरेवायं पुरुष इति । वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति । वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येति । तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीति । एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[जनकः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, अस्तमिते आदित्ये चन्द्रमसि अस्तमिते शान्ते अग्नौ, अयम् पुरुषः किंज्योतिः एव [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] वाक् एव अस्य ज्योतिः भवति इति । अयम् वाचा एव ज्योतिषा आस्ते, पल्ययते, कर्म कुरुते, विपल्येति । सम्राट्, वै तस्मात् अपि यत्र स्वः पाणिः न विनिर्ज्ञायते, अथ यत्र वाक् उच्चरति, तत्र एव उप न्येति इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, एतद् एवम् एव [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जनक ने पूछा: सूर्य और चन्द्रमा अस्त हों तथा अग्नि बुझ गई हो, तब इस पुरुष की ज्योति क्या है? वाणी उसकी ज्योति होती है। वाणी को प्रकाश मानकर वह बैठता है, जाता है, कर्म करता है और लौटता है। इसलिए, सम्राट्, जहाँ अपना हाथ भी साफ दिखाई नहीं देता, वहाँ जिस ओर आवाज उठती है, मनुष्य उसी ओर जाता है। जनक ने कहा: याज्ञवल्क्य, यह ठीक है।
English meaning
Janaka asked, “When sun and moon have set and fire has gone out, what is the person’s light?” “Speech. With speech as light the person sits, goes out, acts and returns. Thus, Your Majesty, even where one cannot distinguish one’s own hand, one moves toward the place from which a voice comes.” “That is so, Yajnavalkya.”
व्याख्या
अन्धकार में आवाज दिशा बताती है। इस उदाहरण से प्रकाश का प्रश्न चेतना और ज्ञान की ओर बढ़ता है, क्योंकि मार्गदर्शन केवल आँख से नहीं मिलता।
Explanation
A voice can orient someone in darkness. The example moves the discussion toward awareness and knowing, since guidance need not arrive through sight.
संदर्भ
ज्योति का अर्थ दृश्य प्रकाश से मार्गदर्शक सूचना तक फैलता है।
Context
Light now extends from visible illumination to guiding information.