Passage 42.1
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये । पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः । यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि । वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् । ओं क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर । अग्ने नय सुपथा रायेऽस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमौक्तिं विधेम ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य मुखम् अपिहितम् [अस्ति] । पूषन्, तत् त्वम् सत्यधर्माय दृष्टये अपावृणु । पूषन्, एकर्षे, यम, सूर्य, प्राजापत्य, रश्मीन् व्यूह; तेजः समूह । यत् ते कल्याणतमम् रूपम् [अस्ति], तत् ते पश्यामि । यः असौ असौ पुरुषः [अस्ति], सः अहम् अमृतम् [ब्रह्म] अस्मि । वायुः अनिलम् [प्रतिगच्छतु]; अथ इदम् शरीरम् भस्मान्तम् [भवतु] । ओम्, क्रतो, स्मर; कृतम् स्मर; क्रतो, स्मर; कृतम् स्मर । अग्ने, देव, विश्वानि वयुनानि विद्वान् अस्मान् राये सुपथा नय । अस्मत् जुहुराणम् एनः युयोधि; ते भूयिष्ठाम् नमौक्तिम् विधेम ।
हिन्दी अर्थ
सत्य का मुख सुनहरे पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन्, उसे हटा दो, ताकि सत्यधर्म का अनुसरण करने वाला मैं उसका दर्शन कर सकूँ। हे पूषन्, हे अकेले पथ पर चलने वाले, हे यम, हे सूर्य, हे प्रजापति के पुत्र, अपनी किरणों को अलग करो, अपने तेज को समेटो। तुम्हारा जो सबसे कल्याणमय रूप है, उसे मैं देखूँ। वह जो वहाँ पुरुष है, वही मैं हूँ। यह प्राणवायु अमृत अनिल में जाए; अब यह शरीर राख में समाप्त हो। ओम्। हे संकल्प, स्मरण करो; किए हुए का स्मरण करो। हे संकल्प, स्मरण करो; किए हुए का स्मरण करो। हे अग्नि, हमें अच्छे मार्ग से समृद्धि की ओर ले चलो। हे देव, तुम सभी मार्गों और कर्मों को जानते हो। हमारे कुटिल पाप को हमसे दूर करो। हम तुम्हें सबसे अधिक नमस्कार-वचन अर्पित करें।
English meaning
The face of truth is covered by a golden vessel. Pushan, uncover it, so that I, devoted to the law of truth, may see. Pushan, solitary traveller, Yama, Sun, offspring of Prajapati: spread apart your rays and draw together your radiance. May I see your most auspicious form. That person who is there, I am that one. May this life-breath pass into the immortal wind; now let this body end in ashes. Om. O resolve, remember; remember what has been done. O resolve, remember; remember what has been done. Agni, lead us by a good path toward well-being. Divine one, you know all courses and deeds. Keep crooked wrongdoing far from us. May we offer you our fullest words of homage.
व्याख्या
स्वर्ण पात्र का चमकता आवरण सत्य को ढक भी सकता है; इसलिए प्रार्थना तेज समेटने और कल्याणमय रूप दिखाने की है। अगले भाग में शरीर की नश्वरता, किए हुए कर्म का दो बार स्मरण और अच्छे मार्ग की याचना साथ आते हैं। यह मृत्यु-सन्दर्भ की धार्मिक प्रार्थना है, मृत्यु लाने, सूर्य देखने या दाह करने की व्यावहारिक विधि नहीं।
Explanation
The shining golden covering can conceal truth, so the prayer asks for radiance to be gathered and the auspicious form revealed. The next parts bring bodily mortality together with a twice-repeated remembrance of deeds and a request for a good path. This is a religious prayer in a setting of mortality, not instructions for causing death, gazing at the sun, or conducting a cremation.
संदर्भ
पाँचवाँ अध्याय सूर्य से दर्शन की प्रार्थना, सौर पुरुष के साथ पहचान, प्राण और शरीर के प्रस्थान तथा अग्नि से मार्गदर्शन की संयुक्त प्रार्थना पर समाप्त होता है। चुना हुआ साक्ष्य इन चार प्रार्थनाओं को एक ही 5.15.1 में रखता है।
Context
The fifth chapter closes with a combined prayer for unveiling the sun, recognition of the solar person, the departure of breath and body, and guidance by Agni. The selected witness groups all four prayers under the single reference 5.15.1.