Passage 24.25
यद्वै तन्न रसयति रसयन् वै तन्न रसयति । न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यत् वै तत् [तत्र सः] न रसयति, रसयन् वै तत् [तत्र सः] न रसयति । हि रसयितुः रसयतेः अविनाशित्वात् विपरिलोपः न विद्यते । तु ततः [आत्मनः] अन्यत् विभक्तम् तत् द्वितीयम् न अस्ति, यत् [सः] रसयेत् ।
हिन्दी अर्थ
जब कहा जाता है कि वह नहीं स्वाद लेता, तब वह स्वाद लेने वाला होते हुए भी नहीं स्वाद लेता। स्वाद लेने वाला की स्वाद लेने की शक्ति का लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। पर उससे अलग, विभक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है जिसे वह अनुभव करे।
English meaning
When it is said that it does not taste, it is still tasting, though not tasting an object. The taster’s capacity for tasting is not lost, for it is imperishable. There is no second thing, separate and distinct from it, for it to taste.
व्याख्या
स्वाद के लिए अलग रस-विषय चाहिए। अद्वैत अवस्था में उसी दूसरे विषय का अभाव कहा जा रहा है।
Explanation
Tasting requires a distinct taste-object; it is the absence of such a second object that is at issue in nonduality.
संदर्भ
अद्वैत निद्रा में स्वाद लेने की चर्चा की जाती है।
Context
The nondual-rest argument now concerns tasting.